संडे स्पेशल: अपनों का कत्ल करने वाले जवानों को तो पकड़ो

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छत्तीसगढ़ में तैनात आईटीबीपी के जवानों में हुए आपसी संघर्ष में गोलियों का चलना और छह जवानों का मारा जाना सच में एक बेहद गंभीर अनुशासनहीनता की घटना है। इसकी अनदेखी करना असम्भव तो है ही, घातक भी है यदि तुरंत सख्त कारवाई नहीं की जाती है। कहा जा रहा है कि एक जवान ने इसलिये गोलियां चला दीं क्योंकि उसे घर जाने की छुट्टी नहीं मिली थी। यह एक स्वाभाविक घटना है। ऐसा रोज ही होता है। लेकिन, इस तरह की घटनाएं हमारे सशस्त्र बलों में बार बार हो रही हैं। जब इस तरह का कोई मामला होता है तो बताया यह जाता है कि किसी जवान ने अपने घर जाने के लिये छुट्टी न मिलने के कारण क़त्लेआम कर दिया। कुछ दिनों तक यह खबरें सुर्खीयों में रहने के बाद दब जाती हैं। फिर सब भुला दिया जाता है। बस यही नहीं होन चाहिए। छुट्टियाँ तो किसी भी सशस्त्र बल में एक स्थायी समस्या है। लेकिन, छुट्टियों की स्वीकृति की पारदर्शी प्रक्रिया का न होना और छुट्टी देने वाले पदाधिकारियों की मनमानी के कारण ही आये-दिन ऐसी समस्यायें पैदा होती रहती हैं।

दरअसल उन कारणों की हमेशा ही गहन समीक्षा होनी चाहिये जिनके चलते जवान खूनी खेल खेलने लगते हैं। यह सही नहीं माना जा सकता की कोई जवान सिर्फ़ इसलिये अपने अफ़सर या साथियों को गोलियों से भून देता है क्योंकि उसे अवकाश नहीं मिला है। आईटीबीपी, बीएसएफ और सीआरपीएफ जैसे उत्कृष्ट अर्ध सैनिक बलों के जवान देश की सरहदों की निगहबानी से ले कर नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात होते हैं । ज़ाहिर है इन्हें लगातार कठोर ड्यूटी करनी पड़ती है। सदैव सतर्कता इनकी ड्यूटी का हिस्सा होता है। इस बात की इन्हें जानकारी होती है कि इन्हें सुबह दस से पांच की ड्यूटी नहीं करनी है। इन जवानों को कड़ी और कठोर ड्यूटी के बदले में सम्मानजनक पगार, पेंशन और दूसरी तमाम सुविधायें तो मिलती हैं। साथ में वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद सुरक्षाबलों के वेतन में भारी इजाफा भी हुआ है। इन सब बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि सुरक्षाबलों के जवानों को हर तरह की सुविधायें मिल रही हैं। लेकिन, समय से छुट्टी न मिलना या छुट्टी की स्वीकृति में अधिकारियों की मनमानी से ऐसी समस्याएं पैदा होती हैं।

क्या उन कारणों के विश्लेषण करने की भी कभी कोशिश की जाती है जिसके कारण इन सुरक्षाबलों की छवि तार तार हो जाती है। अगर उन कारणों को जानने की कोशिश होती है तो परिणाम क्यों नहीं सामने आते?

भारत सरकार ने 1962 में चीन के साथ जंग के बाद आईटीबीपी की स्थापना की थी। आईटी बीपी को ही यह ज़िम्मेदारी दी गई कि वह चीन से लगी सीमा पर नज़र रखे। उसने इस काम को बखूबी निभाया भी । आई टी बी पी के जवानों ने अपने शौर्य और पराक्रम से शत्रुओं के इरादों को कभी सफल नहीं होने दिया। आई टी बी पी को अन्य दायित्व भी मिलते रहे हैं। उसने कभी देश को निराश नहीं किया। इस बल के जवान और अधिकारी कई बार इंडियन पीस कीपिंग फोर्स का भी हिस्सा रहे हैं। यानि इन्होंने अपनी लगन, बहादुरी और मेहनत का प्रदर्शन देश और देश से बाहर दिया है। इतने खास सुरक्षा बल को ले कर आई ऐसी दुखद खबर से सरकार और देश निराश ही है। बेशक आई टी बी पी की छवि को धब्बा नहीं लग सकता, तो भी यह कहना होगा की उन तत्वों पर कठोर कार्यवाही की जाये जिनकी वजह से उक्त हादसा हुआ। सेना, पुलिस और सुरक्षाबलों में अनुशासनहीनता तो कतई बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

इस बीच, गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि साल 2007 से 2012 तक अर्ध सैनिक बलों के करीब 700 जवानों ने खुदकुशी की। यह आंकड़ा बहुत बड़ा और डरावना है। आखिर क्यों इतने सारे जवानों ने अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर ली? इतने जवान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं -इसकी जांच तो होनी ही चाहिये। दो बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं- पहली, सुरक्षा बलों की सेवा शर्तोँ की लगातार समीक्षा होनी चाहिये। उनके मसले लगातार हल भी किए जाते रहें । दूसरी, इन बलों के बिगडे हुए जवानों पर कठोर कारवाई भी हो।

आरके सिन्हा

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