गुरु पूर्णिमा का महत्व, देवता से भी पहले दिया गया है गुरु को स्थान

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Guru Purnima

मुंबई: हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का बहुत महत्व है। गुरु की पूजा और स्मरण के लिए समर्पित गुरु पूर्णिमा मंगलवार (16 जुलाई) को है। इस बार गुरु पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण की छाया है। 16 जुलाई की रात में लगने वाले चंद्र ग्रहण का सूतक मंगलवार को शाम 4:30 से लग जाएगा, इसलिए इससे पूर्व ही गुरु का पूजन करना उचित है।

भारतीय संस्तृति में माता-पिता के बाद गुरु और फिर देवता को स्थान दिया गया है। कहा भी गया है ‘माता-पिता, गुरु, देवता’. गुरु जीवन का पथ प्रदर्शक हैं, इसलिए पुराणों में उनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य माना गया है।

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

इन्हें समर्पित है गुरु पूर्णिमा
गुरु पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास जी को ही समर्पित है। महर्षि वेद व्यास जी का जन्म आषाढ़ मास के पूर्णिमा को हुआ था। उनको समस्त मानव जाति का प्रथम गुरु माना जाता है। उन्होंने महाभारत की रचना की थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन बहुत से लोग अपने दिवंगत गुरु अथवा ब्रह्मलीन संतों के चिता या उनकी पादुका का धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, चंदन, नैवेद्य आदि से विधिवत पूजन करते हैं। गुरु को ब्रह्म कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार से वह जीव का सर्जन करते हैं, ठीक उसी प्रकार से गुरु शिष्य का सर्जन करते हैं। हमारी आत्मा ईश्वर रूपी सत्य का साक्षात्कार करने के लिए बेचैन है और ये साक्षात्कार वर्तमान शरीरधारी पूर्ण गुरु के मिले बिना संभव नहीं है, इसीलिए हर जन्म में वो गुरु की तलाश करती है।

ऐसे करें पूजा-अर्चना –

सर्वप्रथम एक साफ स्थान पर श्वेत वस्त्र को बिछाकर उस चावल रखें। चावल के ऊपर कलश और उसके ऊपर नारियल रखें।
इसके पश्चात उत्तराभिमुख होकर अपने सामने गुरु का या भगवना शिव की तस्वीर रखें। भोलेनाथ को भी गुरु मान सकते हैं।
महादेव को गुरु मानकर मंत्र पढ़ते हुए श्रीगुरुदेव का आवाहन करें।

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