गणपति स्पेशल: क्यों मनाया जाता हैं गणेशोत्सव, क्यों लगाया जाता है “गणपति बप्पा मोरया” का जयकारा

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मुंबई: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। शिवपुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। विद्वानों के अनुसार पहले ये पर्व सिर्फ एक दिन ही मनाया जाता था, लेकिन वर्तमान में ये उत्सव 10 दिन मनाया जाता है और 11वे दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।

सिर्फ 1 दिन मनाया जाने वाला पर्व 10 दिनों तक क्यों मनाया जाता है, इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण कारण छिपा है। आज हम आपको उसी के बारे में बता रहे हैं। हिंदू धर्म में शैव-वैष्णव जैसे कई उपासना पंथ हैं। इनमें गणपति की उपासना कनरे वालों को गाणपत्य कहा जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व हजारों साल से मनाया जा रहा है। जब भारत में पेशवाओं का शासन था, उस समय इस पर्व को भव्य रूप से मनाया जाने लगा।

सवाई माधवराव पेशवा के शासन में पूना के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने पेशवाओं के राज्य पर अधिकार कर लिया। इसके कारण गणेश उत्सव की भव्यता में कमी आने लगी, लेकिन ये परंपरा बनी रही। उस समय हिंदू भी अपने धर्म के प्रति उदासी हो गए थे।

युवकों में अपने धर्म के प्रति नकारात्मकता और अंग्रेजी आचार-विचार के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था। उस समय महान क्रांतिकारी व जननेता लोकमान्य तिलक ने सोचा कि हिंदू धर्म को कैसे संगठित किया जाए?

लोकमान्य तिलक ने विचार किया कि श्रीगणेश ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो समाज के सभी स्तरों में पूजनीय हैं। गणेशोत्सव एक धार्मिक उत्सव होने के कारण अंग्रेज शासक भी इसमें दखल नहीं दे सकेंगे। इसी विचार के साथ लोकमान्य तिलक ने पूना में सन् 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरूआत की। तिलक ने गणेशोत्सव को आजादी की लड़ाई के लिए एक प्रभावशाली साधन बनाया।

धीरे-धीरे पूरे महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। ये वो दौर था जब अन्य धर्मों के लोग भी हिंदू धर्म पर हावी हो रहे थे। इस संबंध में लोकमान्य तिलक ने पूना में एक सभा आयोजित की। जिसमें ये तय किया गया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक गणेश उत्सव मनाया जाए।

10 दिनों के इस उत्सव में हिंदुओं को एकजुट करने व देश को आजाद करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर भी विचार किया जाता था। क्या आप जानते है कि गणपति बप्पा मोरया क्यों बोला जाता है। आइए जानते है इसके पीछे का कारण। गणपति के जयकारे की कहानी महाराष्ट्र के एक गांव चिंचवाड़ गांव से जुडी है।

इस गांव में एक संत पैदा हुए थे जिनका नाम मोरया गोसावी था। माना जाता है भगवान गणेश के आशीर्वाद के बाद ही मोरया का जन्म हुआ था। वह जन्म से ही भगवान गणेश जी भक्ति में लीन रहने लगे थे। जब भी गणेश चतुर्थी होता था तब मोरया गोसावी चिंचवाड़ से कई किलोमीटर पैदल चलकर मयूरेश्वर मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने जाते थे। यह सिलसिला 117 साल तक चला। अधिक उम्र हो जाने की वजह से उन्हें मयूरेश्वर मंदिर तक जाने में काफी मुश्किलें पेश आने लगी थीं। तब एक दिन गणपति उनके सपने में आए।

मोरया के सपने में भगवान गणेश जी ने उनसे कहा कि एक मूर्ति नदी में मिलेगी। इसके बाद जैसा उन्‍होंने सपने में देखा था वैसा ही हुआ नदी में स्‍नान करने के दौरान उन्‍हें गणेश प्रतिमा प्राप्‍त हुई। लोगों को जब इस घटना की जानकारी हुई तो लोग चिंचवाड़ गांव में मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आने लगे।

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